How Rainbow is Formed

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How Rainbow is Formed

क्या आपने कभी सोचा है कि बारिश के बाद आसमान में ये खूबसूरत रंग कहाँ से आते हैं? यह कोई जादू नहीं, बल्कि विज्ञान है! जब सूरज की सफेद रोशनी हवा में तैरती पानी की नन्ही बूंदों से मिलती है, तो प्रकृति का सबसे सुंदर नजारा बनता है।

आइए इसे करीब से देखें। हमारे पास सूर्य की सफेद रोशनी की एक किरण है। दिखने में यह सफेद है, लेकिन असल में इसमें सात अलग-अलग रंग छिपे होते हैं। और यहाँ हवा में लटकी पानी की एक गोल बूंद है।

जैसे ही यह रोशनी की किरण पानी की बूंद के अंदर प्रवेश करती है, वैसे ही इसकी गति धीमी हो जाती है और यह थोड़ा मुड़ जाती है। इसी पल रोशनी का अपने असली रंगों में बिखरने का सफर शुरू होता है।

अब जैसे ही सूर्य का श्वेत प्रकाश हवा से पानी की एक गोल बूंद में प्रवेश करता है, जादू का पहला कदम शुरू होता है। यह पानी की बूंद एक नन्हे प्रिज्म की तरह काम करने लगती है।

जैसे ही यह प्रकाश बूंद की सतह को छूता है, सबसे पहले होता है अपवर्तन। चूंकि पानी हवा से सघन माध्यम है, इसलिए प्रकाश की गति धीमी हो जाती है और वह अंदर की ओर मुड़ जाता है।

लेकिन यह सिर्फ मुड़ता नहीं है, बल्कि अपने घटक रंगों में बिखर भी जाता है! इसे हम विक्षेपण कहते हैं। लाल रंग की तरंग दैर्ध्य सबसे लंबी होने के कारण वह सबसे कम मुड़ता है, जबकि बैंगनी रंग सबसे ज्यादा मुड़ जाता है। इस तरह श्वेत प्रकाश सात रंगों के बैंड में विभाजित होने लगता है।

अपवर्तन और विक्षेपण के बाद, अलग-अलग रंगों में बंटी ये किरणें पानी की बूंद के पिछले हिस्से की ओर बढ़ती हैं। जब ये किरणें इस पिछली दीवार से टकराती हैं, तो एक बेहद दिलचस्प घटना होती है। प्रकाश बाहर निकलने के बजाय, अंदर ही वापस मुड़ जाता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी दर्पण से टकराकर रोशनी वापस आती है।

आइए इस बूंद के भीतर के नजारे को देखें। यहाँ, यह प्रकाश की किरण बूंद की पिछली दीवार पर टकराती है। इस कोण के कारण, पानी की सतह एक प्राकृतिक शीशे की तरह काम करने लगती है। इसे हम 'पूर्ण आंतरिक परावर्तन' कहते हैं, जहाँ बूंद की पिछली दीवार एक दर्पण बन जाती है और प्रकाश को वापस अंदर की ओर मोड़ देती है।

याद रखें, इस पूरी प्रक्रिया में प्रकाश बूंद से बाहर नहीं निकलता, बल्कि अंदर ही टकराकर मुड़ जाता है। यही कारण है कि इसे 'पूर्ण आंतरिक परावर्तन' कहा जाता है। अब ये परावर्तित रंगीन किरणें वापस आगे की सतह की ओर बढ़ रही हैं, जहाँ से ये बाहर निकलकर सीधे हमारी आँखों तक पहुँचेंगी।

अब आता है इस यात्रा का अंतिम चरण। जब यह परावर्तित प्रकाश बूंद के निचले हिस्से से वापस हवा में बाहर निकलता है, तो इसका माध्यम फिर से बदलता है। पानी से हवा में आते ही इसकी गति बढ़ जाती है और यह एक बार फिर मुड़ता है, यानी इसका दोबारा अपवर्तन होता है। यह अंतिम मोड़ अलग-अलग रंगों को और अधिक फैला देता है।

यहीं पर हमें मिलता है वह जादुई कोण! जब लाल रंग का प्रकाश हमारी आँखों तक पहुँचता है, तो आने वाली धूप की सीधी रेखा और इस बाहर निकलती किरण के बीच ठीक बयालीस डिग्री का कोण बनता है। बैंगनी रंग के लिए यह कोण लगभग चालीस डिग्री होता है। इसी सटीक झुकाव के कारण आसमान में एक खूबसूरत धनुष आकार दिखाई देता है, जिसमें लाल रंग हमेशा सबसे बाहर और बैंगनी सबसे अंदर होता है।

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